Sunday, February 26, 2023

Senior Breath of Breath Eazy, T. B & Allergy Specialist Dr. S. K

Senior Breath of Breath Eazy, T. B & Allergy Specialist Dr. S. K reader said in a discussion - "The biggest problem for asthma patients is during changing seasons, when winter is approaching to summer or when winter is coming, their breath is uprooting. And asthma attacks start coming.

Dr. Pathak explains - "The weather is changing at the moment, feeling cold in the morning and late nights. Children or adults are getting sick due to not being health alert in changing seasons. People are suffering from fever along with colds-cough, allergies, pneumonia. Heart patients with asthma need to be careful. A little carelessness can be heavy on health. Sleeping by running a fan at night can deteriorate health. Things that can cause trouble for asthma patients as the changing seasons include changes in weather temperature as well as things like pollen particles, dust, smoke, pollution in the air. Holi festival is also near, it is made of ghee-oil Excessive consumption of things can also be harmful for asthma patients."
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Wednesday, February 22, 2023

टीबी संक्रमण से बचने के लिए अपने प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत रखें

 

– डॉ. एस. के पाठक

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ब्रेथ ईजी चेस्ट सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल (अस्सी, वाराणसी) के वरिष्ठ टी.बी श्वांस एवं फेफड़ा रोग विशेषज्ञ डॉ. एस.के पाठक ने ऑनलाइन के मध्यम से लोगो को जागरूक किया, जिसमे डॉ. पाठक ने ऑनलाइन दर्शको को टी.बी के प्रति जागरूक किया I डॉ. पाठक ने बताया टी.बी दिवस हर साल 24 मार्च को मनाया जाता है, इसके लिए हम सभी को टीबी को खत्म करने के लिए प्रयास करने की आवश्यकता है I डॉ. पाठक ने यह भी बताया कि –“इसके लिए हमे अच्छी योजना बनाना होगा जोकि सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है, हमें आम जनता के बीच टी.बी की स्थिति को समझने की जरूरत है I

डॉ. पाठक ने टी.बी के लिए कुछ सुझाव दिए जैसे – “टीबी संक्रमण से बचने के लिए अपने प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत रखें, कई अलग-अलग चीजें आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर बना सकती हैं, जिनमें शामिल हैं - पर्याप्त ताजा भोजन और विटामिन न मिलना, पर्याप्त नींद न लेना, बहुत अधिक परिश्रम करना या बहुत अधिक पार्टी करना, ड्रग्स का उपयोग करना, शराब पीना और धूम्रपान करना, तनाव, गरीब आवास, दीर्घकालिक बीमारी आदि I”

डॉ. पाठक ने आगे बताया – “किसी व्यक्ति के लिए स्वस्थ संतुलित आहार जैसे अनाज, बाजरा और दालें, शारीरिक गतिविधि, फल और मेवे और बीज विटामिन ए, सी और ई का एक उत्कृष्ट स्रोत हैं, इन आहारों को दैनिक आहार व्यवस्था में शामिल किया जाना चाहिए I”

अंत में डॉ. पाठक ने सभी को एकजुट होने को कहा – “आइए हम एक साथ काम करें और अब तैयारी शुरू करें, आइए हम टीबी को समाप्त करने के लिए अपनी प्रतिबद्धताएं दें I



Tuesday, February 21, 2023

सर्दियों में रखे सुरक्षित फेफड़े को, कमजोर न होने पाए फफड़े – डॉ एस.के पाठक

 सर्दियों में रखे सुरक्षित फेफड़े को, कमजोर न होने पाए फफड़े – डॉ एस.के पाठक

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पिछले दिनों एक परिचर्चा में ब्रेथ ईजी के वरिष्ठ श्वांस, टी.बी एवं अस्थमा रोग विशेषज्ञ डॉ. एस.के पाठक ने बताया – “सर्दियों में अक्सर लोगों को सांस से जुड़ी समस्या होने लगती है । ऐसा बढ़ती ठंड और हवा में शामिल नमी के कारण होता है। लेकिन अगर सांस ठीक से ना आए और बॉडी को पूरा ऑक्सीजन ना मिले तो सेहतमंद रहना संभव नहीं है, और पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन न मिलने से अस्थमा अटैक के साथ – साथ हार्ट अटैक की सम्भावना भी बढ़ जाती हैं I”

डॉ. पाठक आगे बताते हैं कि – “ठंड के मौसम में फेफड़ों से संबंधित बीमारियों के होने का खतरा सबसे ज्यादा बढ़ जाता है I खांसी में कफ है और कफ सीने में जकड़ जाए, तो सांस लेने में तकलीफ हो सकती है। सांस की नली में सूजन, संक्रमण हो सकता है, जिससे फेफड़ों पर भी नकारात्मक असर हो सकता है। लगातार बलगम वाली खांसी होने का मतलब है कि फेफड़े हेल्दी नहीं हैं। इसमें ब्रोंकाइटिस (Bronchitis) होने की संभावना बढ़ सकती है। इससे लंग इंफेक्शन (Lung Infection) का रिस्क भी बढ़ सकता है। सर्दियों में फेफड़ों से संबंधित समस्या जैसे निमोनिया, सीओपीडी, अस्थमा आदि ट्रिगर कर जाती हैं।“

डॉ पाठक आगे बताते हैं कि – “कई मरीज़ों में कोविड19 के दौरान या उससे ठीक होने के बाद दिल संबंधित या दूसरी बीमारियाँ और कॉम्प्लिकेशन देखने को भी मिले हैं, दरसल इस कॉम्प्लिकेशन को ठण्ड के मौसम में ज्यादा होने की सम्भावना होती हैं I” डॉ पाठक ये भी बताते है कि –“ब्लड प्रेशर के मरीज़, शुगर के पेशेंट और ज़्यादा मोटे लोगों में कोविड19 बीमारी के दौरान दिल की बीमारी का रिस्क ज़्यादा होता है I”

डॉ पाठक ने बताया – “कोरोना का कहर कम होने के बाद लोग बेधड़क होकर घरों से निकलने लगे हैं। ऐसे में लोगों को अपना इम्यूनिटी सिस्टम और फेफड़े को स्ट्रांग रखना बहुत जरूरी है । क्योंकि भीड़भाड़ और बाहरी वातावरण में स्वस्थ रहना किसी चुनौती से कम नहीं है। फेंफड़ों को स्ट्रांग करने के लिए रोजाना हल्की एक्सरसाइज करें। इसके लिए आप तेज चलें, दौड़े, स्विमिंग करें, साइकिल चलाएं, इससे सांस लेने की क्षमता बढ़ेगी और आपके फेफड़ों की कार्य क्षमता में भी सुधार होगा । इसके साथ ही हेल्दी डाइट लें, तला गला भोजन नहीं करना चाहिए, पौष्टिक आहार लें, पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन लें, ताकि आपकी श्वसन की मांसपेशियां और फेफड़ों की ताकत बढ़ें । इसके साथ-साथ धूम्रपान और शराब से दूरी बनाकर रखे, गुनगुने पानी का ही सेवन करे, अपने वजन को कंट्रोल में रखे और घर से बाहर निकलते समय मास्क लगाकर ही निकले, इससे आप किसी भी प्रकार के संक्रमण से बच पाएंगे।

Monday, February 20, 2023

टी.बी के इलाज में न बरते लापरवाही, टीबी का इलाज छोड़ा तो परिणाम खतरनाक ! -डॉ.एस के पाठक (वरिष्ट टी.बी, श्वास एवं एलर्जी रोग विशेषज्ञ)

-डॉ.एस के पाठक (वरिष्ट टी.बी, श्वास एवं एलर्जी रोग विशेषज्ञ)

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टी.बी. एक बैक्टीरिया माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस द्वारा उत्पन्न संक्रमण है। यह बैक्टीरिया शरीर के सभी अंगों में प्रवेश कर जाता है। हालांकि ये ज्यादातर फेफड़ों में ही पाया जाता है। मगर इसके अलावा आंतों, मस्तिष्क, हड्डियों, जोड़ों, गुर्दे, त्वचा तथा हृदय भी टीबी से ग्रसित हो सकते हैं। टी.बी अब लाइलाज बीमारी नही है, इसका पूरा इलाज संभव है, तथा इस इलाज में ६-८ माह का समय लगता है, और टी.बी की बिमारी पूर्णत: ठीक हो सकती है I भारत में प्रतिवर्ष लगभग ३.७ लाख लोग टी.बी के कारण मौत के शिकार हो जाते है, प्रतिदिन १००० से ज्यादा लोगो की इस बीमारी से मृत्यु हो जाती है, प्रति १.५ मिनट में टी.बी के एक मरीज की मृत्यु हो जाती है, इस बीमारी के प्रति लापरवाही बरतने से खतरनाक टी.बी का जन्म हो सकता है, जिसे एम् डी आर टी.बी कहते है, जिसका इलाज काफी खर्चीला और लगभग २ साल तक चलता है I

टी.बी के लक्षणों में दो हफ्तों से ज्यादा खासी आना शाम के समय प्राय: बुख़ार का आना, कफ़ में खून व बलगम का आना, लगातार वजन का घटना आदि मुख्यत: होते हैं I एम्,डी.आर टी.बी, टी.बी का ही एक खतरनाक रूप होता है जिसमे टी.बी के कीटाणु पर टी.बी कि नार्मल (FIRST LINE ) दवाइयां असर नही करती, ऐसे मरीजो के कफ की पूरी जाँच पड़ताल करके (कल्चर सेंसिविटी) के द्वारा सही दवा (SECOND LINE) की दवा शुरू की जाती है जिसका कोर्स लगभग २ वर्ष तक चलता है I टीबी का इलाज छोड़ देने से मरीज को और खतरनाक परिणाम भुगतने हो सकते है, जिसमें बहु औषधि टीबी, और बड़े पैमाने पर दवा प्रतिरोधी टीबी के रुप में बीमारी सामने आ सकती है।

टी.बी के बचाव के लिए मुख्यत: जिन बातो को ध्यान में रखना चाहिए वो हैं अपने डॉक्टर की सलाह के अनुसार अपनी दवा ठीक समय व पूरी अवधि तक लेनी चाहिए, इधर-उधर नहीं थूकना चाहिए, सफाई का विशेष ध्यान देना चाहिए, टी.बी रोगी जब भी छिके, अपने रुमाल से मुहँ अवश्य ढके, हमेशा हवादार व साफ़ सुथरी जगह पर रहे I टी.बी के मरीजों में नियमित भोजन जिसमे प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, विटामिन होना चाहिए, जैसे हरी सब्जियां, दूध, अंडा आदि का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होता हैं I

Saturday, February 18, 2023

एलर्जी के खतरे से रहे सावधान, हो सकता हैं अस्थमा – डॉ एस के पाठक

 एलर्जी के खतरे से रहे सावधान, हो सकता हैं अस्थमा – डॉ एस के पाठक

ब्रेथ ईजी टी.बी, चेस्ट, एलर्जी केयर सेंटर अस्सी वाराणसी द्वारा “ब्रेथ ईजी सेमिनार कांफ्रेंस हॉल” में आयोजित एक “पेशेंट्स एजुकेशन प्रोग्राम” में डॉ. एस.के पाठक (वरिष्ठ श्वांस, एलर्जी, फेफड़ा रोग विशेषज्ञ) ने मरीजों को बताया की “एलर्जी का खतरा लगातार बढ़ रहा है, इससे सावधान रहने की जरुरत हैं, अमूमन बदलते मौसम में एलर्जी का खतरा बढ़ जाता है I इसकी अनदेखी करने से स्थिति भयावह हो सकती है और अस्थमा का खतरा बढ़ सकता है I गले में खरास, सर्दी जुखाम, नाक और आँख से पानी, बार-बार छिके आना और नाक में खुजली के साथ चकत्ते का बने रहना, साधारण सर्दी लम्बे समय तक बने रहना, कभी-कभी बुखार एवं मांसपेशियों में दर्द आदि एलर्जी का लक्षण है I यदि इसका सही निदान न हो तो ८०% एलर्जी के रोगी अस्थमा के मरीज बन जाते हैं I”

आगे डॉ. पाठक ने बताया “यह बीमारी वंशानुगत भी होती है तो इसकी संभावना बच्चो में ५०% तक बढ़ जाती हैं I एलर्जी एक शारीरिक प्रतिक्रिया है जो शरीर के इम्यून सिस्टम में डिस्टर्बेंस के कारण होती हैं I इम्यून सिस्टम हानिकारक चीजे जैसे बक्टेरिया, वायरस का हमला होने पर शरीर में एक प्रतिरोधक क्षमता बनता है I कभी-कभी इम्यून सिस्टम दुश्मन को पहचानने में गलती करता है, तो शरीर सामान्य चीजो जैसे वायु प्रदुषण, धुल मिटटी, बदलते मौसम, पेड़-पौधों के पराग कण या कभी-कभी कुछ खाने पीने की चीजों से प्रतिक्रिया कर बैठता है और इसका शरीर पर बुरा असर पड़ता हैं I”

डॉ. पाठक ने यह भी बताया कि “एलर्जी के इलाज के लिए बाजार में कई सारे एंटीएलर्जिक दवाईयां उलब्ध है जो लेने पर तुरंत आराम तो देती हैं पर जैसे ही दवा का असर खत्म हो जाता हैं तो समस्या फिर से खड़ी हो जाती हैं, इसका स्थायी इलाज सिर्फ एकमात्र इम्युनोथेरेपि (वैक्सीन) ही हैं, जिसके द्वारा भविष्य में एलर्जी की संभवना कम हो जाती हैं, और वैक्सीन से शरीर का इम्यून सिस्टम नियंत्रित हो जाता हैं, जिससे शरीर में एलर्जी रोग लड़ने की क्षमता स्वत: हो जाती हैं एवं मरीजो को एलर्जी रोग से छुटकारा मिलने की संभवना बढ़ जाती हैं I यदि किसी व्यक्ति को एलर्जी की समस्या है तो इसकी जाँच एलर्जी टेस्टिंग द्वारा की जाती है, जिसके द्वारा एलर्जी के बारे में सटीक जानकारी प्राप्त हो जाती हैं I एलर्जी जाँच एवं इम्युनोथेरेपि (वैक्सीन) दोनों की सुविधा ब्रेथ इजी टी.बी, चेस्ट, एलर्जी केयर सेंटर अस्सी वाराणसी पर उपलब्ध हैं I समय रहते एलर्जी की जाँच कराये, और यदि एलर्जी की बीमारी पाई जाती हैं तो इम्युनोथेरेपि (वैक्सीन) के द्वारा इलाज कराये, जिसके द्वारा भविष्य में होने वाले अस्थमा जैसे घातक रोग से बचा जा सकता हैं I “

Wednesday, February 15, 2023

वायु प्रदूषण कारण, प्रभाव और बचाव के उपाय

 वायु प्रदूषण कारण, प्रभाव और बचाव के उपाय

Breathe Easy - A Group of Hospital

वायु प्रदूषण के कारण

  • विश्व की बढ़ती जनसंख्या ने प्राकृतिक साधनों का अधिक उपयोग किया है। औद्योगीकरण से बड़े-बड़े शहर बंजर बनते जा रहे हैं।
  • उद्योगों से निकलने वाला धुआँ, कृषि में रासायनों के उपयोग से भी वायु प्रदूषण बढ़ा है।
  • आवागमन के साधनों की वृद्धि आज बहुत अधिक हो रही है। इन साधनों की वृद्धि से इंजनों, बसों, वायुयानों, स्कूटरों आदि की संख्या बहुत बढ़ी है। इन वाहनों से निकलने वाले धुएँ वायुमण्डल में लगातार मिलते जा रहे हैं जिससे वायुमण्डल में असन्तुलन हो रहा है।
  • वनों की कटाई से वायु प्रदूषण बढ़ा है क्योंकि वृक्ष वायुमण्डल के प्रदूषण को निरन्तर कम करते हैं। पौधे हानिकारक प्रदूषण गैस कार्बन डाई आक्साइड को अपने भोजन के लिए ग्रहण करते हैं और जीवनदायिनी गैस आक्सीजन प्रदान करते हैं, लेकिन मानव ने आवासीय एवं कृषि सुविधा हेतु इनकी अन्धाधुन्ध कटाई की है और हरे पौधों की कमी होने से वातावरण को शुद्ध करने वाली क्रिया जो प्रकृति चलाती है, कम हो गई है।
  • परमाणु परीक्षण से नाभिकीय कण वायुमण्डल में फैलते हैं जो कि वनस्पति व प्राणियों पर घातक प्रभाव डालते हैं।

वायु प्रदूषण के प्रभाव

  1. यदि वायुमण्डल में लगातार अवांछित रूप से कार्बन डाइ आक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड, नाइट्रोजन, आक्साइड, हाइड्रो कार्बन आदि मिलते रहें तो स्वाभाविक है कि ऐसे प्रदूषित वातावरण में श्वास लेने से श्वसन सम्बन्धी बीमारियाँ होंगी। साथ ही उल्टी घुटन, सिर दर्द, आँखों में जलन आदि बीमारियाँ होनी सामान्य बात है
  2. वाहनों व कारखानों से निकलने वाले धुएँ में सल्फर डाइ आक्साइड की मात्रा होती है जो कि पहले सल्फाइड व बाद में सल्फ्यूरिक अम्ल (गंधक का अम्ल) में परिवर्तित होकर वायु में बूदों के रूप में रहती है।
  3. कुछ रासायनिक गैसें वायुमण्डल में पहुँच कर वहाँ ओजोन मण्डल से क्रिया कर उसकी मात्रा को कम करती हैं। ओजोन मण्डल अन्तरिक्ष से आने वाले हानिकारक विकरणों को अवशोषित करती है। हमारे लिए ओजोन मण्डल ढाल का काम करता है लेकिन जब ओजोन मण्डल की कमी होगी तब त्वचा कैंसर जैसे भयंकर रोग से ग्रस्त हो सकती है।
  4. वायु प्रदूषण से भवनों, धातु व स्मारकों आदि का क्षय होता है। ताजमहल को खतरा मथुरा तेल शोधक कारखाने से हुआ है।
  5. वायुमण्डल में आक्सीजन का स्तर कम होना भी प्राणियों के लिए घातक है क्योंकि आक्सीजन की कमी से प्राणियों को श्वसन में बाधा आयेगी।
  6. कारखानों से निकलने के बाद रासायनिक पदार्थ व गैसों का अवशोषण फसलों, वृक्षों आदि पर करने से प्राणियों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।

वायु प्रदूषण को नियन्त्रित करने के उपाय

  1. कारखानों को शहरी क्षेत्र से दूर स्थापित करना चाहिए, साथ ही ऐसी तकनीक उपयोग में लाने के लिए बाध्य करना चाहिए जिससे कि धुएँ का अधिकतर भाग अवशोषित हो और अवशिष्ट पदार्थ व गैसें अधिक मात्रा में वायु में न मिल पायें।
  2. जनसंख्या शिक्षा की उचित व्यवस्था की जाए ताकि जनसंख्या वृद्धि को बढ़ने से रोका जाए।
  3. शहरी करण की प्रक्रिया को रोकने के लिए गाँवों व कस्बों में ही रोजगार व कुटीर उद्योगों व अन्य सुविधाओं को उपलब्ध कराना चाहिए।
  4. वाहनों में ईंधन से निकलने वाले धुएँ को ऐसे समायोजित, करना होगा जिससे की कम-से-कम धुआँ बाहर निकले।
  5. निर्धूम चूल्हे व सौर ऊर्जा की तकनीकि को प्रोत्साहित करना चाहिए।
  6. ऐसे ईंधन के उपयोग की सलाह दी जाए जिसके उपयोग करने से उसका पूर्ण आक्सीकरण हो जाय व धुआँ कम-से-कम निकले।
  7. वनों की हो रही अन्धाधुन्ध अनियंत्रित कटाई को रोका जाना चाहिए। इस कार्य में सरकार के साथ-साथ स्वयंसेवी संस्थाएँ व प्रत्येक मानव को चाहिए कि वनों को नष्ट होने से रोके व वृक्षारोपण कार्यक्रम में भाग ले।
  8. शहरों-नगरों में अवशिष्ट पदार्थों के निष्कासन हेतु सीवरेज सभी जगह होनी चाहिए।
  9. इसको पाठ्यक्रम में शामिल कर बच्चों में इसके प्रति चेतना जागृत की जानी चाहिए।
  10. इसकी जानकारी व इससे होने वाली हानियों के प्रति मानव समाज को सचेत करने हेतु प्रचार माध्यम जैसे दूरदर्शन, रेडियो पत्र-पत्रिकाओं आदि के माध्यम से प्रचार करना चाहिए।

Monday, February 13, 2023

बदलते मौसम में एलर्जी/ अस्थमा मरीज रहे सावधान ---- डॉ. एस.के पाठक

 बदलते मौसम में एलर्जी/ अस्थमा मरीज रहे सावधान ---- डॉ. एस.के पाठक

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ब्रेथ ईजी चेस्ट सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल, अस्सी, वाराणसी द्वारा “ब्रेथ ईजी सेमिनार कांफ्रेंस हॉल” में आयोजित एक “पेशेंट्स एजुकेशन प्रोग्राम” में डॉ. एस.के पाठक (वरिष्ठ श्वांस, एलर्जी, फेफड़ा रोग विशेषज्ञ) ने मरीजों को बताया कि “मौसम बदलने के साथ बीमारियों का खतरा भी बढ़ता जाता है, इस समय मौसम में बदलाव तेजी से हो रहा है, सुबह और शाम में ठंड बढ़ गई है। ऐसे में बच्चों और उम्रदराज लोगो को गर्म पकड़े पहनाएं, सुबह शाम में बाहर कम निकलने दें। जरा सी लापरवाही से सर्दी के साथ बुखार और खांसी शुरू हो जा रही है। अगर समय से इलाज नहीं हो रहा है तो निमोनिया के शिकार हो जा रहे हैं । यह मौसम श्वांस रोगियों के लिए विशेष एहतियात बरतने का है। सांस, दमा रोगियों को तैलीय खाद्य पदार्थों से परहेज रखना चाहिए । डॉ. पाठक ने मरीजों को अस्थमा के लक्षण के बारे में भी बताया जिसमे सांस लेने में परेशानी होना, दम घुटना, सांस लेते समय आवाज होना, सांस फूलना, छाती में कुछ जमा हुआ सा या भरा हुआ सा महसूस होना, बहुत खांसने पर चिकना-चिकना कफ आना, मेहनत वाले काम करते समय सांस फूलना आदि होते हैं।“

डॉ. पाठक ने मरीजों को आगे बताया कि “बदलते हुए मौसम में एलर्जी व अस्थमा के मरीजों को दिक्कतें ज्यादा बढ़ जाती हैं, इसलिए उनके चिकित्सक द्वारा बताए गए इन्हेलर/ नेसल स्प्रे को उन्हें नियमित इस्तमाल करना चाहिए व एलर्जी के मरीजों को इस दौरान एलर्जी टेस्ट करवाकर उसके अनुरूप दवा पुन: लेना चाहिएI अस्थमा के मरीजों को मौसम के अचानक बदलाव से सावधान रहना चाहिए, खास तौर पर सुबह के वक्त बिस्तर से उठकर एकदम खुली हवा में नहीं जाना चाहिए, बल्कि थोड़ा इंतजार करें। अस्थमा बढ़ाने वाले एलर्जी के तत्व बदलते हुए मौसम में ज्यादा होने की वजह से दमा के मरीजों को ज्यादा तकलीफ होती है, ऐसे में अस्थमा के रोगियों को विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए। उन्हें जल्दी-जल्दी गर्म और सर्द तापमान में नहीं जाना चाहिए। इसके अलावा इस मौसम में स्वस्थ रहने के लिए अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाना बेहद अहम है। जिन लोगों की प्रतिरक्षा प्रणाली ठीक होती है, उन्हें सर्दी- जुकाम आदि जैसी समस्याएं आसानी से नहीं होती।

डॉ. पाठक ने यह भी बताया कि “एलर्जी के इलाज के लिए बाजार में कई सारे दवाईयां उलब्ध है, जो लेने पर तुरंत आराम तो देती हैं पर जैसे ही दवा का असर खत्म हो जाता हैं तो समस्या फिर से खड़ी हो जाती हैं, इसका स्थायी इलाज सिर्फ एकमात्र इम्युनोथेरेपि (वैक्सीन) ही हैं, जिसके द्वारा भविष्य में एलर्जी की संभवना कम हो जाती हैं, और वैक्सीन से शरीर का इम्यून सिस्टम नियंत्रित हो जाता हैं, जिससे शरीर में एलर्जी रोग लड़ने की क्षमता स्वत: हो जाती हैं एवं मरीजो को एलर्जी रोग से छुटकारा मिलने की संभवना बढ़ जाती हैं I यदि किसी व्यक्ति को एलर्जी की समस्या है तो इसकी जाँच एलर्जी टेस्टिंग द्वारा की जाती है, जिसके द्वारा एलर्जी के बारे में सटीक जानकारी प्राप्त हो जाती हैं I एलर्जी जाँच एवं इम्युनोथेरेपि (वैक्सीन) दोनों की सुविधा ब्रेथ ईजी चेस्ट सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल, अस्सी, वाराणसी पर उपलब्ध हैं I समय रहते एलर्जी की जाँच कराये, और यदि एलर्जी की बीमारी पाई जाती हैं तो इम्युनोथेरेपि (वैक्सीन) के द्वारा इलाज कराये, जिसके द्वारा भविष्य में होने वाले अस्थमा जैसे घातक रोग से बचा जा सकता हैं I “

Sunday, February 12, 2023

एलर्जी के खतरे से रहे सावधान, हो सकता हैं अस्थमा – डॉ एस के पाठक

 एलर्जी के खतरे से रहे सावधान, हो सकता हैं अस्थमा –  डॉ एस के पाठक

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ब्रेथ ईजी टी.बी, चेस्ट, एलर्जी केयर सेंटर अस्सी वाराणसी द्वारा “ब्रेथ ईजी सेमिनार कांफ्रेंस हॉल” में आयोजित एक “पेशेंट्स एजुकेशन प्रोग्राम” में डॉ. एस.के पाठक (वरिष्ठ श्वांस, एलर्जी, फेफड़ा रोग विशेषज्ञ) ने मरीजों को बताया की “एलर्जी का खतरा लगातार बढ़ रहा है, इससे सावधान रहने की जरुरत हैं, अमूमन बदलते मौसम में एलर्जी का खतरा बढ़ जाता है I इसकी अनदेखी करने से स्थिति भयावह हो सकती है और अस्थमा का खतरा बढ़ सकता है I गले में खरास, सर्दी जुखाम, नाक और आँख से पानी, बार-बार छिके आना और नाक में खुजली के साथ चकत्ते का बने रहना, साधारण सर्दी लम्बे समय तक बने रहना, कभी-कभी बुखार एवं मांसपेशियों में दर्द आदि एलर्जी का लक्षण है I यदि इसका सही निदान न हो तो ८०% एलर्जी के रोगी अस्थमा के मरीज बन जाते हैं I” 

आगे डॉ. पाठक ने बताया “यह बीमारी वंशानुगत भी होती है तो इसकी संभावना बच्चो में ५०% तक बढ़ जाती हैं I एलर्जी एक शारीरिक प्रतिक्रिया है जो शरीर के इम्यून सिस्टम में डिस्टर्बेंस के कारण होती हैं I इम्यून सिस्टम हानिकारक चीजे जैसे बक्टेरिया, वायरस का हमला होने पर शरीर में एक प्रतिरोधक क्षमता बनता है I कभी-कभी इम्यून सिस्टम दुश्मन को पहचानने में गलती करता है, तो शरीर सामान्य चीजो जैसे वायु प्रदुषण, धुल मिटटी, बदलते मौसम, पेड़-पौधों के पराग कण या कभी-कभी कुछ खाने पीने की चीजों से प्रतिक्रिया कर बैठता है और इसका शरीर पर बुरा असर पड़ता हैं I”

डॉ. पाठक ने यह भी बताया कि “एलर्जी के इलाज के लिए बाजार में कई सारे एंटीएलर्जिक दवाईयां उलब्ध है जो लेने पर तुरंत आराम तो देती हैं पर जैसे ही दवा का असर खत्म हो जाता हैं तो समस्या फिर से खड़ी हो जाती हैं, इसका स्थायी इलाज सिर्फ एकमात्र इम्युनोथेरेपि (वैक्सीन) ही हैं, जिसके द्वारा भविष्य में एलर्जी की संभवना कम हो जाती हैं, और वैक्सीन से शरीर का इम्यून सिस्टम नियंत्रित हो जाता हैं, जिससे शरीर में एलर्जी रोग लड़ने की क्षमता स्वत: हो जाती हैं एवं मरीजो को एलर्जी रोग से छुटकारा मिलने की संभवना बढ़ जाती हैं I यदि किसी व्यक्ति को एलर्जी की समस्या है तो इसकी जाँच एलर्जी टेस्टिंग द्वारा की जाती है, जिसके द्वारा एलर्जी के बारे में सटीक जानकारी प्राप्त हो जाती हैं I एलर्जी जाँच एवं इम्युनोथेरेपि (वैक्सीन) दोनों की सुविधा ब्रेथ इजी टी.बी, चेस्ट, एलर्जी केयर सेंटर अस्सी वाराणसी पर उपलब्ध हैं I समय रहते एलर्जी की जाँच कराये, और यदि एलर्जी की बीमारी पाई जाती हैं तो इम्युनोथेरेपि (वैक्सीन) के द्वारा इलाज कराये, जिसके द्वारा भविष्य में होने वाले अस्थमा जैसे घातक रोग से बचा जा सकता हैं I “

श्वांस की नयी मशीन (स्पाईरोडॉक्) से पाए सांस रोगी उत्तम ईलाज

 श्वांस की नयी मशीन (स्पाईरोडॉक्) से पाए सांस रोगी उत्तम ईलाज

– डॉ. एस.के पाठक (वरिष्ठ टी.बी, चेस्ट, एलर्जी रोग विशेषज्ञ, ब्रेथ ईजी, वाराणसी)

ब्रेथ ईजी चेस्ट सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के वरिष्ठ टी.बी, चेस्ट, एलर्जी रोग विशेषज्ञ डॉ. एस.के पाठक ने एक वार्ता में बताया कि – “श्वांस की नयी मशीन (स्पाईरोडॉक्) के द्वारा सांस के मरीजों का अब और बेहतर तरीके से इलाज हो सकेगा I इस मशीन के द्वारा 6-मिनट वॉक टेस्ट करायी जाती हैं, जिसके द्वारा मरीज की साँस की शुरूआती समस्या को पहचाना जा सकता हैं I इस मशीन के द्वारा शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा - चलने फिरने में कितना कम हो रहा है, हार्ट की गति - कितना ज्यादा हो रहा है, व ब्लड प्रेशर - कितना हाई हो रहा हैं, इस मशीन द्वारा पता लगाया जा सकता हैं I डॉ. पाठक ने आगे बताया – “यह एक क्लिनिकल रेस्पिरेटरी टेस्ट हैं, जिससे एक व्यक्ति के दिल और फेफड़ों का हाल जाना जा सकता है। अगर किसी व्यक्ति में ऑक्सीजन का स्तर कम हो रहा होगा, तो इस टेस्ट से ये पता लगाया जा सकता हैं I पहले ये टेस्ट सिर्फ बड़े शेहरो जैसे दिल्ली, मुंबई, आदि जैसे मेट्रो शहर में संभव थे, परन्तु अब ये टेस्ट वाराणसी के विश्वस्तरीय स्तर के अस्पताल ब्रेथ ईजी (अस्सी, वाराणसी) में उपलब्ध हैं I”

यह मशीन कई बीमारी के स्तर को पता लगाने के लिए कारगर साबित हो सकती हैं जैसे - सी.ओ.पी.डी, पल्मोनरी हाइपरटेंशन, हार्ट फेलिअर, सिस्टिक फाइब्रोसिस, आई.एल.डी, सांस फूलने के किसी भी कारण को पहले से ही पता लगाने के लिए I यह टेस्ट कोरोना जैसी गंभीर बीमारी को पता लगाने में भी काफी सहायक हैं I

यह टेस्ट ब्रेथ ईजी अस्पताल में अफोर्डेबल प्राइस पर उपलब्ध हैं, इस टेस्ट को कराने के लिए हेल्पलाइन नंबर 8933050004 पर फ़ोन करके कोई भी अपॉइंटमेंट ले सकता हैं I डॉ. पाठक का मानना हैं कि ब्रेथ ईजी अस्पताल में मरीज विश्वस्तरीय स्तर का इलाज कम समय व कम खर्च में करा सकते हैं I

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